महिला दिवस: समानता, सम्मान और आत्मविश्वास की पुकार
नारी सशक्तिकरण: एक दिन नहीं, हर दिन का संकल्प
महिला दिवस की सार्थकता: जब बदलेगी समाज की सोच
डॉ. संगीता परमानंद
साहित्यकार, कथाकार, विमर्शक

वैसे तो मात्र 8 मार्च ही नहीं, प्रत्येक दिवस, प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण महिलाओं का है। क्योंकि सृष्टि की सृजनकर्ता नारी को केवल एक दिवस विशेष तक सीमित करने का सामर्थ्य ब्रह्माण्ड की किसी भी शक्ति में नहीं। वास्तव में इस दिवस विशेष का आरंभ 28 फरवरी 1909 में अमेरिका में हुआ था। तात्कालीन परिस्थितियों में अनेक देशों में महिलाओं को उनके संवैधानिक एवं प्राथमिक अधिकार, मत देने से वंचित रखा गया। अपने इस अधिकार प्राप्ति के लिए जागरूक महिलाओं ने वर्ष 1917 में एक आंदोलन छेड़ दिया। आंदोलन की उग्रता के समक्ष घुटने टेक जार ने रूस की सत्ता से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद गठित अंतरिम सरकार ने महिलाओं को उनके अधिकार ससम्मान प्रदान किए। जूलियन कैलेंडर के अनुसार यह दिवस 23 फरवरी रविवार का था, जबकि अन्य देशों के ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 8 मार्च का। और महिलाओं के शक्ति सामर्थ्य एवं विशेषतया अन्याय विरोध की मुखरता के जय यशस्विता के इस ऐतिहासिक दिवस से ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का संपादन सम्पूर्ण विश्व में होने लगा। भारतीय परिवार, भारतीय समाज एवं राष्ट्र के संदर्भ में निःसंदेह महिलाओं ने स्वकर्तव्य सभी क्षेत्रों में यश का ,अपनी विशेष उपस्थिति का समर्पण एवं कार्यकुशलता का परचम लहराया है। धरती से नभ एवं नीर तक का प्रत्येक पड़ाव उसकी यशगाथा एवं उपलब्धियों का मील का पत्थर बन अडिगता से प्रत्येक की संघर्ष गाथा हिम्मत, हौसला , ध्येय साधना, समर्पण , अंकित करता जा रहा है। राष्ट्र नेतृत्व हो, महत्वपूर्ण प्रभार, अथवा सेना में कमिश्नर पद सभी का निर्बाध कुशलता पूर्वक संचालन नारी कुशलता से कर रही है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी सैन्य कार्यवाही से विश्व को परिचित कराने वाली भी विंग कमांडर व्योमिका सिंह, कर्नल सोफिया। कुरैशी नारियां ही थी। प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, चिकित्सा, खेल, अंतरिक्ष, रक्षा, विमान संचालन, रेल संचालन, पर्वतारोहण, अंतरिक्ष विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों में जहां महिलाओं ने न केवल अपनी भागीदारी दर्ज कराई है बल्कि प्रत्येक क्षेत्र विशेष को अपनी उपस्थिति से गुणात्मक, , अविस्मरणीय एवं उपलब्धियों के इंद्रधनुषी रंगों से दीप्तिमान किया है। इन सभी उपलब्धियों, सफलताओं एवं कुशलता-दक्षता की इस सशक्त उपलब्धि को देखकर भी परिवेश एवं समाज इसे समग्र समानता के लिए स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहा है? कड़वा एवं निर्विवादित सत्य है कि वैचारिक एवं मानसिक परिवर्तनशीलता की यथास्थिति के अभाव में नारी होने के बावजूद इतना ऊँच-नीच अनुभव क्यों होता है। जब तक सामाजिक स्वीकार्यता नहीं होगी तब तक महिला दिवस मनाने की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं हो सकेगी। अत्यंत सामान्य एवं सहज रूप से अधिकांशतः बेटियों के माता-पिता सार्वजनिक रूप से स्वीकारते हैं कि “हमारी बेटियां बेटों से कम हैं क्या?” किंतु मीडिया एवं प्रचार माध्यम इस स्वीकारोक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं। निस्संदेह समतामूलक समाज की स्थापना के लिए वैचारिक परिवर्तन एवं मानसिकता का बदलाव अत्यंत आवश्यक है। महिलाओं को स्वयं भी अपनी संकीर्णता, परम्परागत रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलना होगा। बेटियां बनानी तो आती हैं, पर काबिल बनाने की जिम्मेदारी भी समाज की है। कामकाजी महिला को भी निभा लोगे न अथवा उच्च शिक्षित चिकित्सक को मेरे बेटे को आशीष करोगी – जैसे अनेक प्रश्न योग्य कन्या को युवक की मांग अथवा वर पक्ष द्वारा ही किए जाते हैं। मूल्यांकन की प्रवृत्ति से हम स्वयं को अपने कार्य, कार्यकुशलता, योग्यता, धैर्यशीलता से आंकते हैं कि क्या अपनी ही आकलन पर अविश्वास का भाव क्यों? स्वर्ग का निर्माण करना, अपनी ही योग्यता पर अविश्वास दिखाना उसका उपहास बनाने वाली हम महिलाएं ही हैं।

महिलाओं की समझ, कार्यकुशलता, कार्यशीलता एवं जागरूकता को अधिकाधिक प्रचारित करने वाली भी महिलाएं ही हैं। यानी प्रत्येक क्षेत्र में इसमें पूर्ण योग्यता, दक्षता, कार्यक्षमता एवं विश्वास ही नहीं, जब तक यह विश्वास जागृत नहीं होता तब तक समानता एवं समरसता की बातें मंचों, परिचर्चाओं, गोष्ठियों और महिला दिवस आयोजनों तक ही सीमित रह जाएंगी। महिला वर्ग विशेष चर्चाओं के दौरान दो तथ्य आर्थिक क्षमता एवं स्वावलंबन विशेष रूप से उल्लिखित होती हैं। घर-बाहर अथवा पेशेवर व्यवस्था भी महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता एवं स्वतंत्र स्वीकृति देती है। किन्तु शिक्षा, करियर एवं रोजगार के सफल मुकाम पर आसीन अधिकांश महिलाएं क्या वास्तव में आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं? जवाब हमारे प्रगतिशील, आधुनिक विचारधारा वाले समाज से ही अपेक्षित है। वास्तव में दुर्भाग्यवश करियर उन्मुख वर्तमान नारी वर्ग आर्थिक सक्षम तो अवश्य है, किन्तु स्वतंत्र नहीं। जहां आर्थिक नियोजन में परिवार की सहमति, सलाह, प्रस्ताव की आवश्यकता होती है, वहीं उसकी सैलरी से ईएमआई एवं अन्य नियोजन पूर्व निर्धारित कर दिए जाते हैं। निस्संदेह कार्य कोई भी छोटा या बड़ा नहीं। क्षमता एवं स्वावलंबन स्वयं सिद्ध भी वरेण्य है। किंतु वैचारिक परिवर्तनशीलता एवं मानसिकता के समरसतामूलक ज्वार को कैसे और कहां रोका जा सकता है? एक दिन विशेष पर महिलाओं के सम्मान में, उनकी योग्यताओं एवं क्षमताओं की कसौटी पर उन्हें सुपर वूमन घोषित करने से, उनके विषय में तमाम सकारात्मक विशेषणों से नवाजने से न तो समता के वातावरण की निर्मिति होगी और न ही समरसतामूलक परिवार एवं समाज का निर्माण होगा। निश्चित नारी को एक स्वतंत्र सामान्य भाव से एक इंसान के रूप में, व्यक्ति के तौर पर, बिना किसी उच्च-नीच तुलनात्मकता के सृष्टि की यूनिक कृति के रूप में स्वीकार किया जाए, तभी संभवतः किसी दिवस पर नहीं बल्कि प्रत्येक दिवस पर महिला दिवस साकार होगा। तब समतामूलक, समरसतामूलक, सामान्य, सामाजिक, डांवाडोलरहित कार्यशीलता पर आधारित विश्वास, आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान एवं महिलाओं के प्रति परस्पर विश्वास का वातावरण निर्मित होगा। अन्यथा महिला दिवस की सार्थकता मंचों, गोष्ठियों, कार्यक्रमों, प्रचार माध्यमों और सोशल मीडिया तक ही सीमित रह जाएगी।

























